कैसे कह दूं कि मुलाकात नहीं होती है
रोज मिलते हैं मगर बात नहीं होती है
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एक रंगीन झिझक एक सादा पयाम
कैसे भूलूं किसी का वो पहला सलाम
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अपने चेहरे से जो जाहिर है छुपाएं कैसे
तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आएं कैसे
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साफ जाहिर है निगाहों से कि हम मरते हैं
मुंह से कहते हुये ये बात मगर डरते हैं
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एक टूटी हुई जंजीर की फरियाद हैं हम
और दुनिया ये समझती है कि आजाद हैं हम
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देख लो आज हमको जी भर के
कोई आता नहीं है फिर मर के
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manish says :manish to suresh saklani




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